धर्म कर्म:::
माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष यह व्रत 29 जनवरी, गुरुवार को मनाया जाएगा।
आचार्य पंडित प्रकाश जोशी ने बताया कि इस दिन गुरुवार को एकादशी तिथि 17 घड़ी 0 पल, अर्थात दोपहर 1:55 बजे तक रहेगी, इसके उपरांत द्वादशी तिथि प्रारंभ हो जाएगी। इस दिन रोहिणी नक्षत्र 1 घड़ी 2 पल, अर्थात प्रातः 7:32 बजे तक रहेगा। ऐंद्र योग 33 घड़ी 20 पल, अर्थात सायं 8:27 बजे तक रहेगा। विष्टि करण 17 घड़ी 0 पल, अर्थात दोपहर 1:55 बजे तक रहेगा। चंद्रमा की स्थिति की बात करें तो इस दिन चंद्रदेव सायं 6:31 बजे तक वृषभ राशि में विराजमान रहेंगे, तत्पश्चात मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे।
जया एकादशी व्रत कथा—
धर्मराज युधिष्ठिर बोले—
हे भगवन्! आपने माघ मास के कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी का अत्यंत सुंदर वर्णन किया। आप स्वेदज, अंडज, उद्भिज और जरायुज—चारों प्रकार के जीवों के उत्पन्न, पालन तथा नाश करने वाले हैं। अब आप कृपा करके माघ शुक्ल एकादशी का वर्णन कीजिए। इसका क्या नाम है, इसकी व्रत विधि क्या है तथा इसमें किस देवता का पूजन किया जाता है?
श्रीकृष्ण बोले—
हे राजन्! इस एकादशी का नाम जया एकादशी है। इस व्रत को करने से मनुष्य ब्रह्महत्या आदि महापापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है तथा भूत-पिशाच आदि योनियों से भी छुटकारा पाता है। इस व्रत को विधिपूर्वक करना चाहिए। अब मैं तुम्हें पद्मपुराण में वर्णित इसकी महिमा की कथा सुनाता हूँ।
देवराज इंद्र स्वर्ग में राज्य करते थे और सभी देवगण सुखपूर्वक निवास कर रहे थे। एक समय इंद्र नंदन वन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे तथा गंधर्व गान कर रहे थे। उन्हीं गंधर्वों में पुष्पदंत, उसकी कन्या पुष्पवती, चित्रसेन तथा उसकी पत्नी मालिनी उपस्थित थीं। मालिनी का पुत्र पुष्पवान तथा उसका मित्र माल्यवान भी वहाँ मौजूद था।
पुष्पवती, गंधर्व माल्यवान को देखकर उस पर मोहित हो गई और अपने रूप-लावण्य व हावभाव से उसे वश में कर लिया। दोनों एक-दूसरे के प्रति आसक्त हो गए। इंद्र को प्रसन्न करने हेतु गान करते समय उनका चित्त विचलित हो गया, जिससे गान में स्वर-ताल की त्रुटि होने लगी।
इंद्र ने उनका प्रेम समझ लिया और इसे अपना अपमान मानते हुए शाप दे दिया। इंद्र बोले—
“हे मूर्खो! तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है, अतः तुम दोनों मृत्यु लोक में जाकर पिशाच योनि को प्राप्त होओगे और अपने कर्मों का फल भोगोगे।”
शाप सुनकर वे अत्यंत दुःखी हुए और हिमालय पर्वत पर पिशाच रूप में जीवन व्यतीत करने लगे। उन्हें गंध, रस और स्पर्श का कोई अनुभव नहीं होता था। अत्यधिक शीत के कारण वे काँपते रहते थे और उन्हें क्षणभर भी नींद नहीं आती थी।
एक दिन पिशाच ने अपनी पत्नी से कहा—
“पिछले जन्म में हमने कौन-सा पाप किया था, जिसके कारण हमें यह दुःखदायी योनि मिली है। इससे तो नरक का दुःख भी श्रेष्ठ प्रतीत होता है। अब हमें कोई पाप कर्म नहीं करना चाहिए।”
दैवयोग से माघ मास के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी आ गई। उस दिन उन्होंने न तो भोजन किया और न ही कोई पापकर्म किया। केवल फल-फूल ग्रहण किए और सायंकाल पीपल वृक्ष के नीचे बैठ गए। रात्रि अत्यंत शीतल थी। ठंड से पीड़ित होकर वे दोनों एक-दूसरे से लिपटकर पड़े रहे और पूरी रात जागरण किया।
हे राजन्! जया एकादशी के उपवास और रात्रि जागरण के प्रभाव से प्रभात होते ही उनकी पिशाच योनि समाप्त हो गई। उन्होंने दिव्य गंधर्व और अप्सरा का सुंदर रूप धारण किया तथा स्वर्गलोक को प्रस्थान किया। देवताओं ने पुष्पवर्षा कर उनका स्वागत किया।
स्वर्ग पहुँचकर उन्होंने देवराज इंद्र को प्रणाम किया। इंद्र ने उन्हें पूर्व रूप में देखकर आश्चर्यपूर्वक पूछा कि उन्होंने पिशाच योनि से मुक्ति कैसे पाई।
माल्यवान ने कहा—
“हे देवेन्द्र! यह सब भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी व्रत के प्रभाव से संभव हुआ है।”
इंद्र बोले—
“तुम धन्य हो। भगवान विष्णु और शिव के भक्त हम सबके लिए वंदनीय हैं। अब तुम दोनों स्वर्ग में सुखपूर्वक विहार करो।”
श्रीकृष्ण बोले—
हे युधिष्ठिर! जया एकादशी के व्रत से मनुष्य बुरी योनियों से मुक्त हो जाता है। जिसने यह व्रत किया, उसने मानो सभी यज्ञ, दान और तप कर लिए। ऐसे भक्त हजार वर्षों तक स्वर्गलोक में वास करते हैं।
व्रत विधि—
इस दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर शौच आदि से निवृत्त होकर पवित्र नदी या जल स्रोत में स्नान करें। यदि यह संभव न हो तो घर पर स्नान के जल में गंगाजल मिलाएँ।
तत्पश्चात तुलसी वृंदावन के समीप चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु एवं लक्ष्मी माता की प्रतिमा स्थापित करें। स्नान कराकर रोली-कुमकुम अर्पित करें, दीप प्रज्वलित करें और जया एकादशी की कथा स्वयं पढ़ें अथवा श्रवण करें।