“काले कौवा काले, घुघुति माला खा ले” हर्षोल्लास के साथ मनाया गया मकर संक्रांति पर्व।

-कुमाऊं में घुघुतिया के रूप में मनाया जाता है यह पर्व

नैनीताल। पूरे उत्तराखंड के साथ ही नैनीताल में भी मकर संक्रांति यानि घुघुतिया त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। बुधवार को मकर संक्रांति के दिन सभी ने सुबह नहा धोकर पूजा पाठ करी और घरों विभिन्न तरह के पकवान और घुघुते बनाए गए। इसके साथ ही धार्मिक स्थलों में भी श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही।
उत्तराखंड में मकर संक्रांति का पर्व केवल एक त्योहार नहीं बल्कि लोक आस्था, प्रकृति और परंपराओं से जुड़ा उत्सव है। कुमाऊं अंचल में मकर संक्रांति को घुघुतिया त्यार या उत्तरायणी के नाम से जाना जाता है। इस दिन से माघ मास के पवित्र महीने की शुरुआत होती है जिसका विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। मकर संक्रांति पर जहां गंगा स्नान, दान-पुण्य और सूर्य उपासना की जाती है वहीं कुमाऊं में इस पर्व से जुड़ी कई परंपराएं आज भी जीवंत हैं।
मकर संक्रांति के दिन कुमाऊं के घरों में आटे और गुड़ से बने घुघुते तैयार किए जाते हैं। इन घुघुतों को बच्चों के गले में माला की तरह पहनाया जाता है और घर-घर में उल्लास का माहौल रहता है। त्यौहार के अगले दिन कौए को घुघुते और मास की खिचड़ी अर्पित की जाती है तथा छोटे बच्चे गले में घुघुति माला पहने कौवे को आवाज लगाकर “काले कौवा काले, घुघुति माला खा ले” गीत गाकर बुलाते हैं। मान्यता है कि उत्तरायणी के दिन कौए गंगा स्नान कर दूसरे दिन सुबह-सुबह घरों में घुघुते और खिचड़ी खाने आते हैं। इसी आस्था के चलते लोग सुबह जल्दी उठकर छतों या आंगन में कौए के लिए प्रसाद रखते हैं।
साथ ही माघ के पहले दिन मास की खिचड़ी खाने की परंपरा भी कुमाऊं की संस्कृति का अहम हिस्सा है। नैनीताल निवासी प्रोफेसर ललित तिवारी ने बताया कि माघ माह के पहले दिन खिचड़ी खाने की परंपरा सदियों पुरानी है। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि धार्मिक प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती है। सूर्य देव को अर्पित करने के बाद ही खिचड़ी का सेवन किया जाता है। बताया कि मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं यानी सूर्य का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर हो जाता है। इसी कारण इस पर्व को उत्तरायणी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि सूर्य के उत्तरायण होने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सूर्य का तेज बढ़ता है। इसी तेज को प्राप्त करने के लिए खिचड़ी का प्रसाद बनाया जाता है। खिचड़ी को भारतीय भोजन का एक संपूर्ण आहार माना जाता है, जिसमें दाल, चावल और मसालों के माध्यम से कई पोषक तत्व मिलते हैं जो सर्दी के मौसम में शरीर को ऊर्जा प्रदान करते है।
इस बार मकर संक्रांति के साथ ही एकादशी होने के चलते खिचड़ी का भोग नहीं बनाया गया क्योंकि मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित होता है।

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