मकर संक्रांति के अगले दिन कौवे को भोज के लिए बुलाते नजर आए बच्चे।

कुमाऊं में आज भी जीवंत है कौवे को भोज के लिए बुलाने की प्रथा, सुबह सुबह गूंजी “काले कौवा काले घुघुति माला खा ले” की आवाज।
नैनीताल। उत्तराखंड की लोक संस्कृति में मकर संक्रांति यानि घुघुती त्यौहार को विशेष स्थान प्राप्त है। इसे कुमाऊं संस्कृति का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है तथा मकर संक्रांति के अगले दिन कौवे को भोज में बुलाने की प्रथा आज भी पहाड़ों में जीवंत है। गुरुवार को घुघुति के अगले दिन सुबह सुबह छोटे छोटे बच्चे गले में घुघुति माला पहने कौवे को भोज के लिए आमंत्रित करते नजर आए। बच्चों ने “काले कौआ काले, घुघुति माला खा ले” गीत गाकर हर्षोल्लास के साथ कौवे को बुलाया और साथ ही कौवे को पूड़ी, प्रसाद अर्पित किया।
मान्यताओं के अनुसार घुघुती पर्व के पीछे एक बेहद भावुक लोककथा जुड़ी है। मान्यता है कि चंद वंश के राजा कल्याणचंद निःसंतान थे, उन्होंने बागनाथ मंदिर में तप और दान-पुण्य किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जिसका नाम निर्भयचंद रखा गया और वही आगे चलकर ‘घुघुति” कहलाए। राजमहल के एक मंत्री ने षड्यंत्र रचकर राजकुमार को मारने की कोशिश की और उसे जंगल ले गया। राजकुमार के रोने की आवाज सुनकर कौवों ने मंत्री पर हमला कर दिया। एक कौवे ने राजकुमार के गले से घुघुती की माला निकालकर राजमहल के द्वार पर टांग दी, जिससे रानी ने अपने पुत्र को पहचान लिया और जंगल जाकर उसे सुरक्षित घर ले आईं। इसके बाद मंत्री को कठोर दंड दिया गया। इसी घटना के बाद मकर संक्रांति के अगले दिन कौवों को बुलाने और उन्हें घुघुती खिलाने की परंपरा शुरू हुई।

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