जंगलों की आग से सुलग रहा ‘पटवा’ का वजूद, वैज्ञानिकों ने जताई चिंता।


नैनीताल। विश्व स्तर पर अति संकटापन्न श्रेणी में शामिल दुर्लभ वनस्पति पटवा का अस्तित्व इन दिनों जंगलों में लग रही आग से गंभीर खतरे में पड़ गया है। इन दिनों पटवा में नारंगी-लाल रंग के आकर्षक फूल खिल रहे हैं, लेकिन वन विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती वनाग्नि इस दुर्लभ प्रजाति को विलुप्ति की ओर धकेल सकती है।
वन अनुसंधान रेंज गाजा के अनुसंधान सहायक योगेश चंद्र त्रिपाठी ने बताया कि आईयूसीएन ने वर्ष 2022 में पटवा को आधिकारिक रूप से ‘अति संकटापन्न’ (क्रिटिकली एंडेंजर्ड) घोषित किया था। उन्होंने कहा कि वनाग्नि इस प्रजाति के लिए अस्तित्वगत संकट बन चुकी है।
त्रिपाठी के अनुसार पटवा का सबसे बड़ा संकट इसका अत्यंत सीमित भौगोलिक दायरा है। यह पौधा दुनिया में केवल 10 वर्ग किलोमीटर से भी कम क्षेत्र में पाया जाता है। ऐसे में किसी बड़े अग्निकांड से इसकी पूरी प्राकृतिक आबादी प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने बताया कि पटवा की वृद्धि दर भी बेहद धीमी है। यह मुख्य रूप से अपनी जड़ों (रूटस्टॉक) के माध्यम से फैलता है। आग से न केवल नवजात पौधे नष्ट होते हैं, बल्कि जमीन के भीतर मौजूद जड़ तंत्र भी क्षतिग्रस्त हो जाता है। इसके बीजों का बाहरी आवरण कठोर होने के कारण आग के बाद नई पौध तैयार होने की प्रक्रिया भी काफी धीमी रहती है।
विशेषज्ञों ने कहा कि लगातार लगने वाली आग मिट्टी की नमी समाप्त कर देती है और क्षेत्र की सूक्ष्म जलवायु को प्रभावित करती है। इसके परिणामस्वरूप आक्रामक खरपतवार तेजी से फैलते हैं, जिससे पटवा के प्राकृतिक आवास का क्षरण होता है और इसके विकास की संभावनाएं कम हो जाती हैं। बताया कि वनों के विखंडन और बढ़ती मानवीय गतिविधियों के बीच वनाग्नि का दबाव जुड़ने से इस प्रजाति के समाप्त होने का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
वन वर्धनिक विवेक तिवारी ने कहा कि संरक्षक अनुसंधान वृत्त हल्द्वानी के निर्देशन में वन अनुसंधान रेंज गाजा द्वारा संचालित इन-सिटू संरक्षण और नर्सरी प्रवर्धन अभियान वर्तमान समय की आवश्यकता है। कहा कि वैज्ञानिक पद्धति से किए जा रहे संरक्षण प्रयासों के माध्यम से इस दुर्लभ प्रजाति को सुरक्षित रखने के लिए विभाग पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रहा है।

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