
नैनीताल। नैनीताल में दुर्गा पूजा की शुरुआत अंग्रेजों के दौर में बंगाली समाज से मानी जाती है। इतिहासकार प्रो. अजय रावत के अनुसार, शहर में दुर्गा पूजा की परंपरा की शुरुआत वर्ष 1864 के आसपास मानी जाती है। उस समय नैनीताल में मई से अक्टूबर तक सचिवालय संचालित होता था। सचिवालय में बड़ी संख्या में बंगाली कर्मचारी कार्यरत थे, जो दशहरे के दौरान दुर्गा पूजा का आयोजन करते थे। धीरे-धीरे यह आयोजन सामूहिक उत्सव में बदल गया और इसे सर्वजनिन दुर्गा पूजा के रूप में पहचान मिली।
प्रो. अजय रावत के अनुसार, नैनीताल का नगरीकरण वर्ष 1841 में शुरू हुआ था। वर्ष 1862 में इसे नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविंसेज एंड अवध की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया गया। उस दौर में छह महीने राजधानी लखनऊ और छह महीने नैनीताल में रहती थी। सचिवालय के नैनीताल में संचालित होने के दौरान यहां कार्यरत बंगाली कर्मचारी दशहरे पर दुर्गा पूजा करते थे। वर्ष 1900 तक आयोजन पर बंगाली समाज का प्रमुख प्रभाव रहा। बाद में स्थानीय लोग भी इससे जुड़ते गए और यह विभिन्न समुदायों का साझा उत्सव बन गया।
बंगाली पर्यटकों का रहता था इंतजार:
एक दौर में सितंबर से नवंबर तक नैनीताल में बंगाली पर्यटकों की आमद का विशेष इंतजार रहता था। प्रो. अजय रावत के अनुसार, मार्च-अप्रैल में मुंबई और गुजरात, जबकि गर्मियों में दिल्ली और हरियाणा के पर्यटक अधिक आते थे। वहीं, शरद ऋतु में बंगाली पर्यटकों की आवाजाही बढ़ जाती थी। उनके आने से शहर में सांस्कृतिक गतिविधियां भी बढ़ती थीं। स्थानीय युवाओं को थिएटर, हॉलीवुड फिल्मों, खानपान और रहन-सहन की नई शैलियों से परिचित होने का अवसर मिलता था। बंगाली पर्यटक ऑटम फेस्टिवल में भी हिस्सा लेते थे।
नैनीताल होटल एसोसिएशन के सचिव वेद साह के अनुसार दुर्गा पूजा से करीब 20 दिन पहले ही बंगाली पर्यटकों का पहुंचना शुरू हो जाता था। त्योहारों की छुट्टियों में बड़ी संख्या में परिवार नैनीताल आते थे। इस दौरान शहर का माहौल कई बार मिनी बंगाल जैसा नजर आता था। पर्यटक नैनीताल के साथ कौसानी, रानीखेत, पिंडारी, मिलम और नारायण आश्रम जैसे स्थानों की सैर भी करते थे।
समय के साथ बंगाली पर्यटकों की यात्रा संबंधी पसंद में बदलाव आया है। पर्यटन कारोबारियों के मुताबिक, नए पर्यटन स्थलों के विकास, बेहतर कनेक्टिविटी और यात्रा खर्च बढ़ने से पर्यटकों के पास अब अधिक विकल्प हैं। इसके बावजूद दुर्गा पूजा नैनीताल और बंगाली समाज के ऐतिहासिक रिश्ते, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और साझा परंपराओं को जीवंत बनाए हुए है।